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Lucknow news- जेपीएनआईसी की 865 करोड़ रुपये की डीपीआर की होगी जांच,मुख्य सचिव के निर्देश पर जारी आदेश, काम कराने के समय हुई मनमानी की भी बनेगी रिपोर्ट

लखनऊ। जेपीएनआईसी के निर्माण में अब 865 करोड़ रुपये की डीपीआर की जांच होगी। शासन की व्यय वित्त समिति खुद देखेगी कि डीपीआर और अनुमोदन से अलग कौन से काम कराए गए। डीपीआर में शामिल गैर जरूरी कामों का भी परीक्षण होगा। इसे लेकर एलडीए से भी रिपोर्ट मांगी गई है। वहीं, शासन ने बिना बजट बढ़ाए जेपीएनआईसी के काम पूरा करने के लिए भी आदेश कर दिया है। इसके लिए न्यूनतम कामों को शामिल करते हुए 865 करोड़ के बजट में ही व्यय वित्त समिति की अनुमति लेकर प्रोजेक्ट पूरा किया जाएगा।

मुख्य सचिव के निर्देश के बाद आवास विभाग के सचिव अजय चौहान ने एलडीए को पत्र भेजा है। विभाग का कहना है कि पूर्व में स्वीकृत बजट में ही जेपीएनआईसी के काम कराए जाएं। बिना शासन के अनुमोदन के जो काम एलडीए ने इसमें कराए, उनका भुगतान शासन द्वारा नहीं होगा। जो काम पूर्व स्वीकृत बजट के अलावा कराए गए हैं, उनका भी भुगतान एलडीए को शासन नहीं करेगा। ये काम कराने वालों का उत्तरदायित्व भी देखा जाएगा। एलडीए इसकी रिपोर्ट बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की अगली बैठक में रखेगा। एलडीए ने संशोधित डीपीआर तैयार व्यय वित्त समिति से अनुमति लेने की कार्रवाई भी शुरू कर दी है। मंडलायुक्त इसकी रिपोर्ट शासन को देंगे।

इन कामों की मिली अनुमति

एलडीए को कुछ काम कराने की अनुमति मिल गई है। इनमें विद्युत यांत्रिक कार्य के लिए भूमिगत केबल की आरसीसी ट्रेंच, सिविल कार्यों के लिफ्ट व एस्कलेटर का इंस्टॉलेशन, एकॉस्टिक ट्रीटमेंट हैं। एलडीए के सेंटेज और जीएसटी के भुगतान देने के लिए भी सहमति मिल गई है, लेकिन इसके लिए व्यय वित्त समिति की अनुमति जरूरी होगी।

सवाल : डीपीआर से 20 प्रतिशत ज्यादा खर्च कैसे?

203 करोड़ के विद्युत व यांत्रिक के काम की अनुमति डीपीआर में थी, फिर भी 249 करोड़ के काम कैसे जेपीएनआईसी में करा दिए गए, यह सवाल फिर उठ रहा है। इसमें से 208 करोड़ खर्च का भुगतान भी एलडीए कर चुका है। यह बिना शासन से अनुमोदन के ही हुआ। इसमें कई काम शामिल ही नहीं किए गए, जैसे ऑडिटोरियम के लिए सीटें खरीदी ही नहीं गईं। चिलर प्लांट के लिए जरूरी एक्सेसरीज भी डीपीआर में शामिल नहीं थीं। ऐसे में यह बजट और अधिक बढ़ेगा। पूर्व की जांच में यह तथ्य सामने आ चुका है।

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