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Lucknow news – ज्ञानवापी केस: जफरयाब जिलानी ने कहा- हम फैसले को चैलेंज करेंगे; बरेली में मौलाना बोले- कुछ लोग बाबरी मस्जिद जैसा मुद्दा बनाने की कोशिश में जुटे

वाराणसी फास्ट ट्रैक कोर्ट ने काशी विश्वनाथ मंदिर और उसी परिसर में बने ज्ञानवापी मस्जिद के विवाद में पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंजूरी दी है। आदेश के मुताबिक पुरातत्व विभाग की पांच सदस्यीय टीम पूरे परिसर की खुदाई कर इस बात का अध्यन करेगी कि क्या ज्ञानवापी परिसर के नीचे जमीन में मंदिर के अवशेष हैं या नहीं? - Dainik Bhaskar

वाराणसी फास्ट ट्रैक कोर्ट ने काशी विश्वनाथ मंदिर और उसी परिसर में बने ज्ञानवापी मस्जिद के विवाद में पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंजूरी दी है। आदेश के मुताबिक पुरातत्व विभाग की पांच सदस्यीय टीम पूरे परिसर की खुदाई कर इस बात का अध्यन करेगी कि क्या ज्ञानवापी परिसर के नीचे जमीन में मंदिर के अवशेष हैं या नहीं?

उत्तर प्रदेश के वाराणसी फास्ट ट्रैक कोर्ट ने काशी विश्वनाथ मंदिर और उसी परिसर में बने ज्ञानवापी मस्जिद के विवाद में पुरातात्विक सर्वेक्षण की मंजूरी दी है। आदेश के मुताबिक पुरातत्व विभाग की पांच सदस्यीय टीम पूरे परिसर की खुदाई कर इस बात का अध्यन करेगी कि क्या ज्ञानवापी परिसर के नीचे जमीन में मंदिर के अवशेष हैं या नहीं? लेकिन इस मसले पर अब विवाद शुरू हो गया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य और वरिष्ठ वकील जफरयाब जिलानी ने कहा कि वे इस फैसले को चुनौती देंगे।

जिलानी ने कहा कि 1991 के प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट में यह बात साफ लिखी है कि बाबरी मस्जिद और दूसरे इबादतगाह पर 15 अगस्त 1947 की स्थिति में बदलाव नहीं किया जा सकेगा। 15 अगस्त 1947 को वहां मस्जिद थी। यह बात अदालत पहले ही मान चुकी है। मैं समझता हूं कि कोर्ट का यह आदेश गलत है।

औरंगजेब ने नहीं बनाई थी ज्ञानवापी मस्जिदवहीं, ऑल इंडिया तजीम उलमा-ए-इस्लाम के महासचिव मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा कि बनारस की ऐतिहासिक ज्ञानवापी मस्जिद मुगल बादशाह हजरत औरंगजेब आलमगीर ने बनवाई थी ये सरासर झूठ बात है। साल 1669 के वक्फ नामा का हवाला दिया जा रहा है, मगर उसके अध्ययन से कहीं यह बात साबित नहीं होती की मंदिर को तोड़ा गया है। औरंगजेब की शख्सियत को पढ़ें तो पता चलेगा कि उन्होंने सैकड़ों मदिरों के रख-रखाव के लिए हजारों बीघा जमीनें दान की। उनका एक मशहूर वाकया इतिहास के पन्नों में महफूज है कि उन्होंने बनारस की ब्राह्मण लड़की को सुरक्षा प्रदान की थी, उस लड़की पर गलत नजर रखने वाले एक मुसलमान कोतवाल को फांसी की सजा दी थी। अब ऐसे बादशाह के तालूक से यह कैसे मुमकिन हो सकता है कि वो मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाए।

मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा कि सिविल जज के फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष फैसले का अध्ययन करने के बाद जिला कोर्ट में अपील दायर करेगा, चूकि इसी से संबंधित हाईकोर्ट में एक मुकदमा विचाराधीन है। कानून यह कहता है कि अगर एक ही मामले में सिविल जज और हाईकोर्ट में केस चल रहा है तो हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार किया जाएगा। जब तक हाईकोर्ट का कोई निर्णय नहीं आ जाता उस वक्त तक सिविल कोर्ट कोई फैसला नहीं सुना सकती है।

गंगा-जमुनी तहजीब को तोड़ने की कोशिश

मौलाना ने आगे कहा कि इस जगह पर अनंद काल से मस्जिद बनी हुई है। इसके अलावा एक जगह दो ज्योर्तिलिंग कैसे हो सकते हैं? केंद्र सरकार ने 1991 में धर्म स्थलों से जुड़े विवादों में यथा स्थिति बनाए रखने के लिए एक कानून पार्लियामेंट में पास किया था। इस कानून में बाबरी मस्जिद मुद्दे को बाहर रखा गया था। इस कानून में स्पष्ट तौर पर यह कहा गया है कि 1947 से पहले जो धर्म स्थल जिस स्थिति में था उसी स्थिति में रहेगा। ज्ञानवापी मस्जिद को भी इसी कानून के तहत सुरक्षा मिली हुई है। मौलाना ने आगे कहा कि चंद फिरकापरस्त ताकतें भारत की गंगा, जमुनी तहजीब और हिंदू-मुस्लिम इत्तेहाद को तोड़ने में लगी हुई हैं। इससे देश वासियों को होशियार रहने की जरूरत है। ज्ञानवापी मस्जिद को बाबरी मस्जिद की तरह राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है।

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