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Lucknow news – डॉक्टर्स डे… लखनऊ के एक डॉक्टर की कहानी: अपनों ने छोड़ा साथ तो डॉक्टर ने एक पेशेंट के घर रखा परिवार; बेड न मिलने पर पिता का घर पर किया इलाज, मगर नहीं बची जान

डॉ दीपक मुख्यमंत्री आवास से महज 300 मीटर के फासले पर स्थित सरकारी सिविल अस्पताल में डॉक्टर हैं। - Dainik Bhaskar

डॉ दीपक मुख्यमंत्री आवास से महज 300 मीटर के फासले पर स्थित सरकारी सिविल अस्पताल में डॉक्टर हैं।

आज नेशनल डॉक्टर्स डे है। डॉक्टरों को धरती पर ईश्वर का रूप माना जाता है। कोरोना काल में तमाम डॉक्टरों ने इसे साबित भी कर दिखाया। ऐसे ही तमाम डॉक्टरों में लखनऊ के सिविल अस्पताल की कार्डियोलॉजी विभाग में तैनात डॉक्टर दीपक भी एक हैं। दीपक कोरोना की पहली लहर बेझिझक मरीजों का इलाज करते रहे। लेकिन दूसरी लहर में वे संक्रमित हो गए। इसके बाद पिता संक्रमित हो गए।

मेडिकल कॉलेज में अपने पिता के लिए एक बेड पाने के लिए दीपक को हर मुश्किल से जूझना पड़ा। वहां इलाज में लापरवाही बरती गई। आखिरकार उन्होंने पिता को घर लाकर ऑक्सीजन सिलेंडर का इंतजाम कर इलाज शुरू किया। लेकिन पिता की मौत हो गई। दैनिक भास्कर ने डॉक्टर दीपक से डॉक्टर्स डे पर बात की तो उनका दर्द छलक पड़ा।

डॉक्टर दीपक ने जैसा कहा, वैसा लिखा गया

‘मैं एक डॉक्टर हूं। अस्पताल में कई लोगों की जिंदगियां बचाईं। आईसीयू में इलाज करते-करते खुद कोरोना संक्रमण की चपेट में आ गया। इसके बाद घर में पिता समेत परिवार के सभी सदस्य कोरोना संक्रमित हो गए। रिश्तेदारों ने भी मुश्किल वक्त में साथ नही दिया। बुजुर्ग पिता के इलाज के लिए गुहार लगाता रहा। मगर, समय पर बेड नहीं मिल सका। बमुश्किल एरा अस्पताल में भर्ती कराया पर वहां ठीक से इलाज नहीं मिला। वो चल बसे। खुद की भी तबियत ज्यादा खराब हो गई।

मुश्किल वक्त में किसी अपने ने साथ नहीं दिया। तब एक पेशेंट का सहारा मिला। बच्चों व पत्नी को उनके घर पर 20 दिनों के लिए रखा। कोरोना से करीब 10 किलो तक वजन घटा। एक महीने बाद फिर से वापस अस्पताल जॉइन किया। तब से लगातार मरीज़ो का उपचार जारी है। तीन दिन पहले ही कोरोना संक्रमित रहे मरीज को इमरजेंसी में अस्पताल लाया गया। इसी बीच उसे हार्ट अटैक आया, फिर से खुद की परवाह न करते हुए उसके इलाज में लगा। ऊपर वाले का शुक्र है, उसकी जान बचाने में कामयाब रहा। आज डॉक्टर्स डे पर उसे डिस्चार्ज कर रहा हूं। अपना काम करने में पीछे नही रहा पर मलाल यही है डॉक्टर होते हुए भी मैं अपने पिता को नहीं बचा पाया।’

अपने पेरेंट्स के साथ डॉ दीपक।

अपने पेरेंट्स के साथ डॉ दीपक।

पिता को खोया पर नहीं भूले उनकी दी हुई सीख

डॉ दीपक मुख्यमंत्री आवास से महज 300 मीटर के फासले पर स्थित सरकारी सिविल अस्पताल में डॉक्टर हैं। उनके 74 साल के पिता अर्जुन चौधरी रेलवे में डिवीजनल कमर्शियल मैनेजर से सेरिटायर्ड थे। डॉक्टर दीपक कहते हैं कि वायरस के संक्रमण ने उनको गंभीर चपेट में ले लिया था। पिता अर्जुन चौधरी डायबिटीज और हार्ट के भी पेशेंट थे। पर अस्पतालों में बेड की किल्लत भारी थी, इसीलिए तमाम प्रयास के बावजूद खुद उन्हें बेड नहीं मिल रहे थे। पिता की सांसें उखड़ने लगी थीं। एक बेटा और वह भी जब डॉक्टर हो तो यह कैसे सहन कर सकता था? बाजार से ऑक्सीजन का सिलिंडर लाकर घर पर ही ऑक्सीजन का सपोर्ट देना शुरु किया। हालांकि इससे ज्यादा राहत मिली नहीं।

थक हार के 7 अप्रैल को दोपहर करीब डेढ़ बजे एक निजी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया पर यहां इलाज की व्यवस्था ही लचर हालत में थी। डॉक्टर मरीज को देखने में कोताही बरतते रहे और डॉ दीपक के पिता इलाज के अभाव में तड़पते रहे। इस लचर सिस्टम से हार मानते हुए डॉक्टर दीपक के पिता ने उसी दिन शाम 5 बजे दम तोड़ दिया। दाह संस्कार करने के नंबर भी 24 घंटे बाद ही मिला।

वापस लौटे मरीजों को बचाने

डॉ दीपक कहते हैं कि यह ऐसा वक्त रहा जिसने मनोबल तोड़ने का काम किया। कोरोना संक्रमित होने के कारण खुद की भी तबियत ज्यादा बिगड़ गई थी। करीब एक महीने बाद अस्पताल में मरीजों के ईलाज के लिए वापस आ सका। पहले मन नही लगा पर पिताजी की सिखाई हुई बात से प्रेरणा लेते हुए वापस से काम मे जुटा हूं। कभी कभी नाईट ड्यूटी भी करता हूं पर मरीज के साथ कभी लापरवाही नहीं। सिविल प्रदेश का पहला ऐसा सरकारी अस्पताल है जहां पर 24 घंटे कैडियोलॉजिस्ट की तैनाती है। इसीलिए दिन रात क्रिटिकल पेशेंट आते है और सभी को बचाने का प्रयास रहता है।

कोरोना से बड़ा है मानव सेवा का भाव

डॉ दीपक कहते है कि डॉक्टर सेवा भाव के मूल सिद्धांत पर काम करता है।कोरोना के दौर में जब कोई अपना करीबी आपके पास नही आता तब भी डॉक्टर नजदीक जाकर इलाज करते है और डॉक्टर का यही धर्म भी है। बस जरुरत है समाज को ऐसे लोगों का साथ देने की, यदि उन्हें कभी जरुरत पड़े तब जरुर काम आएं।

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