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Lucknow news- रेलवे के स्लीपरों से बनेंगे फर्नीचर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकेंगे, अभी रेलवे स्टोर में रखकर होती है नीलामी

रेलवे प्रशासन अब साल की लकड़ी के बने स्लीपरों को कबाड़ के भाव में नहीं बेचेगा। बल्कि वन निगम के प्रयास से इससे फर्नीचर बनाकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगी कीमतों में बेचेगा। इसकी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। वन निगम को अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक, कुशल वन प्रबंधन के तहत प्रोग्राम एंडोर्समेंट फॉरेस्ट सर्टिफिकेट (पीईएफसी) मिल गया है। अब वन निगम अपने उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसानी से बेच सकेगा।

मालूम हो कि अंग्रेजी हुकूमत में अफसर पटरियों को जोड़ने के लिए साल की लकड़ी के स्लीपर बिछाते थे। ये स्लीपर मजबूत होने के साथ टिकाऊ होते थे। पर अब अब रेलवे मीटरगेज की जगह ब्रॉडगेज कर रहा है तो कंक्रीट के स्लीपर लगाए जा रहे हैं। ऐसे में लकड़ी के जर्जर स्लीपरों को स्टोर में भेजकर नीलामी कराई जाती है। जो अमूमन कबाड़ के भाव बेच दिए जाते हैं। पर, अब ऐसा नहीं होगा। वन प्रमाणीकरण के बाद अब स्लीपरों को लेकर फर्नीचर बनाया जाएगा। जिन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचकर कमाई की जाएगी। इससे फर्नीचर बनाने वाले, रेलवे तथा वन निगम तीनों का मुनाफा होगा।

पांच शहरों में खुलेगा बांस बाजार

कुकरैल स्थित मौलश्री ऑडिटोरियम में बांस क्षेत्र का विकास विषयक दो दिवसीय कार्यशाला चल रही है। दूसरे दिन शनिवार को कार्यशाला को वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री दारा सिंह चौहान ने संबोधित किया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में बांस आधारित शिल्प को बढ़ावा देने के लिए पांच शहरों सहारनपुर, बरेली, झांसी, मीरजापुर व गोरखपुर में सामान्य सुविधा केंद्रों की स्थापना की जा रही है। राष्ट्रीय बांस मिशन योजना के अंतर्गत ऐसा किया जा रहा है। बांस की खेती व शिल्प उद्योग बढ़ाने के लिए मशीनें लगाई जाएंगी। बताया कि बांस नकदी फसल है। बांस एक घंटे में 70 मिमी तक बढ़ता है। 35 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड सोखता है।

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