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बिना कोचिंग दूसरे प्रयास में प्रांजल ने हासिल किया UPSC मे सफलता,जानिए देश की पहली दृष्टिबाधित’IAS प्रांजल पाटिल’की कहानी

यूपीएससी की परीक्षा देश की सबसे कठिन परीक्षा मानी जाती है. हर साल लाखों विद्यार्थी परीक्षा को देते हैं लेकिन इनमें से वही विद्यार्थी पास हो पाते हैं जो कड़ी मेहनत करते हैं. इस परीक्षा को पास करने के लिए कड़ी मेहनत के साथ-साथ सही रणनीति अपनाना बहुत जरूरी है.

कई ऐसे विद्यार्थी होते हैं जो कई साल मेहनत करने के बाद इस परीक्षा में सफलता हासिल करते हैं और कुछ ऐसे भी अभ्यर्थी होते हैं जो पहले ही प्रयास में इस परीक्षा में सफलता हासिल कर लेते हैं. इस परीक्षा में सफलता हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत सही रणनीति के साथ साथ धैर्य का होना भी काफी आवश्यक है. आज हम आपको एक ऐसे आईएएस अधिकारी की कहानी बताने वाले हैं जो दृष्टिबाधित होते हुए भी अपने सपने को पूरा की.

दूसरे अटेम्प्ट में मारी बाजी –

आज हम आपको महाराष्ट्र की रहने वाली IAS प्रांजल पाटिल के बारे में बताने वाले हैं. उन्होंने अपनी आंखें नहीं होने के बाद भी हार नहीं मानी और दूसरे प्रयास में इस परीक्षा में सफलता हासिल की. सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने इस परीक्षा को पास करने के लिए भी किसी भी तरह का कोचिंग ज्वाइन नहीं किया. 2016 में उन्होंने पहला अटेम्प्ट दिया, उन्होंने 744वीं रैंक हासिल की. फिर 2017 में दूसरे अटेम्प्ट में 124वीं रैंक हासिल की. इस तरह वह देश की पहली दृष्टिबाधित महिला IAS अधिकारी भी बनीं.

6 की उम्र में गंवा दी आंखों की रोशनी- प्रांजल की आंखों में बचपन से ही दिक्कत थी और बड़ी होते होते उन्होंने पूरी तरह से अपनी आंखें गवा दी. लेकिन उन्होंने हार नहीं माना और लगातार अपने सपने को पूरा करने के लिए कोशिश करती रही.

कभी नहीं गईं कोचिंग-

आपको बता दें कि प्रांजल ने यूपीएससी की तैयारी के लिए किसी भी तरह का कोचिंग ज्वाइन नहीं किया.उन्होंने अपडेटेड सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जो उन्हें यूपीएससी के कई किताबों को जोर-जोर से पढ़कर सुनाता था. उनकी आंखें नहीं थी इसलिए उन्होंने यूपीएससी की तैयारी सुनकर किया.

नहीं मिल सकी थी रेलवे में नौकरी – यूपीएससी से पहले उन्होंने रेलवे की नौकरी के लिए परीक्षा पास की. क्योंकि प्रांजल की आंखें नहीं थी इसलिए रेलवे ने उन्हें नौकरी देने से मना कर दिया. उसके बाद उन्होंने कड़ी मेहनत किया और आईएएस बनने के सपने को पूरा कर दिखाया.

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