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Lucknow news- गोमती की 26 में से 22 सहायक नदियां सूखीं

बुरे हालात : गोमती की 26 में से 22 सहायक नदियां सूखीं

अतुल भारद्वाज

लखनऊ। अंधाधुंध जल दोहन और नदी तट विकास के नाम पर बनाई डायफ्रॉम वॉल ने गोमती नदी का पूरा रिवर सिस्टम ही बिगाड़ दिया है। नदी के भूगर्भ जल से पोषित होने से जहां पानी का बहाव कम हो गया है, वहीं गोमती की 26 सहायक नदियों में से 22 सूख गई हैं। खतरनाक हो चुकी स्थिति का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि अन्य चार सहायक नदियों में भी आंशिक रूप से ही बहाव बचा है। ऐसे में गोमती का प्रवाह बने रहने पर ही संकट मंडरा रहा है। इसका खुलासा बीबीएयू के पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर डॉ. वेंकटेश दत्ता के अध्ययन में हुआ है। यह शोध इंडियन जर्नल ऑफ ईकोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।

डॉ. दत्ता का कहना है कि गोमती नदी और भूगर्भ जल एक दूसरे के पूरक की तरह काम करते हैं। मानसून में जहां भूगर्भ जल गोमती बेसिन से रीचार्ज होता है तो मानसून के पहले व बाद में इससे नदी को अपना प्रवाह बनाए रखने में मदद मिलती है। अध्ययन में यह पता चला है कि लखनऊ में गोमती द्वारा 76 प्रतिशत पानी भूगर्भ जल से लिया जाता है। इसे बेस फ्लो इंडेक्स भी कहा जाता है, जो बताता है कि नदी के लिए भूगर्भ जल का महत्व कितना है? अब संकट यह है कि भूगर्भ जल का स्तर गोमती के रिवरबेड से नीचे चला गया है। इससे भी नदी को पानी नहीं मिल पा रहा है।

पानी का दोहन ज्यादा, रीचार्ज कम

प्रोफेसर डॉ. वेंकटेश दत्ता का कहना है कि सहायक नदियों के खत्म होने से जहां बड़ा संकट खड़ा हुआ है, वहीं 1984 से 2015 के बीच भूगर्भ जल स्तर पांच मीटर से और नीचे 18 मीटर पर पहुंच गया है। इसमें सबसे अधिक गिरावट वर्ष 2005 से 2015 के बीच हुई है। यह अनुपात करीब 47 प्रतिशत है। यह बताता है किस तरह हमारे इंजीनियर केवल दोहन का विज्ञान अपना रहे हैं। जितना पानी निकाला जा रहा है, उससे कम हम रीचार्ज कर पा रहे हैं। इसकी वजह यह है कि हमारी पास मौजूद भूजल रीचार्ज क्षमता से अधिक पानी का दोहन किया जा रहा है।

एक बेहतर योजना बनाने की जरूरत

डॉ. दत्ता का कहना है कि रिवर सिस्टम को बचाने के लिए विकास आधारित जल प्रबंधन योजना बनानी होगी। ऐसी योजना हो जिससे नदी और भूगर्भ जल के समन्वय को सुधारा जा सके। रिवरफ्र ंट डवलपमेंट के नाम पर हम पहले ही 16 मीटर गहरी डायफ्राम वॉल बनाकर लखनऊ के मध्य क्षेत्र में रीचार्ज क्षेत्र और नदी को अलग कर चुके हैं। अंधाधुंध जल दोहन को भी न्यूनतम करना होगा। हम पहले ही ऐसा नुकसान कर चुके हैं जिसे ठीक करने में 50 साल से अधिक समय लग जाएगा।

941 किमी में बहती है गोमती नदी

गोमती नदी का उद्गम पीलीभीत की फुलहर झील से है। इसके बाद यह लखनऊ सहित 14 जिलों से गुजरती है। 941 किमी का सफर तय करके गोमती वाराणसी के पास गंगा में मिल जाती है। इस कारण इसे गंगा की सहायक नदी भी कहा जाता है।

ये हैं गोमती की सहायक नदियां

गचई नदी, जोकनई नदी, भैंसी नदी, चुहा नाला, अंडी नाला, खठीना नदी, चितवा नाला, घरेरा नाला, सरायन नदी, नाखा नाला, अक्राड्डी नाला, बेहता नदी, कुकरैल नदी, लोनी नदी, असैैना नाला, रेठ नदी, कल्याणी नदी, अराही नाला, कंदू नाला, गोबरिया नाला, सेवई नाला, पीली नदी, सेवई नाला, बलोई नदी, सई नदी, नंद नदी। इसमें से केवल सई, खठीना, कुकरैल और बेहता नदी में ही आंशिक रूप से बहाव बचा है, जोकि पतली धारा या तालाब के रूप में दिखता है।

मौसमी नदी बन गई गोमती

डॉ. दत्ता का कहना है कि रिवर सिस्टम प्रभावित होने की वजह से गोमती नदी मौसमी हो गई है। यह कभी वार्षिक प्रवाह वाली नदी थी, लेकिन अंधाधुंध जल दोहन और सहयोगी नदियों का संरक्षण नहीं होने से आज इसका यह हाल हो गया है। इससे नदी ही नहीं आने वाले समय में हमारे खाद्य संसाधन और जलीय जीवन भी प्रभावित होगा। यह सीधे तौर पर मानवीय जिंदगी पर असर डालेगा।

60 प्रतिशत तक घटा नदी का प्रवाह

डॉ. दत्ता का कहना हैै कि भूजल की कमी से पर्यावरणीय प्रवाह और मछलियों जैसे जलीय प्रजातियों के पारिस्थितिक परिणामों की कभी जांच नहीं की जाती है, जबकि यह बहुत जरूरी है। अध्ययन में देखा कि भूजल गोमती नदी व अन्य में जल प्रवाह का प्रमुख स्रोत है। जल स्तर में गिरावट से बारहमासी नदियां मौसमी होती जा रही हैं। गोमती जैसी गंगा की कई सहायक नदियां इसमें शामिल हैं। पिछले 50 सालों में इन नदियों के जल स्तर में 30 से 60 फीसदी तक की गिरावट आई है। नदी में प्रवाह कम हुआ तो रीचार्ज सिस्टम प्रभावित हुआ। इससे भूगर्भ जल में मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र में गिरावट आई। पानी की स्थायी उपलब्धता और पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण के लिए सतही जल के उपयुक्त प्रबंधन के साथ भूगर्भ जल को रिजर्व रखने वाले एक्वेफर को रीचार्ज करना बहुत जरूरी है। इसके उलट मृत हो चुकी सहायक नदियों को ही हम नाला बना दे रहे हैं।

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