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Lucknow news- नेताओं के परिवार नहीं, कार्यकर्ताओं को लड़ाएंगे पंचायत चुनाव, नए प्रदेश प्रभारी ने शुरू किया मिशन यूपी पर काम

भाजपा इसी महीने पंचायत चुनाव को लेकर मंडलीय बैठकों के जरिये जमीनी फीडबैक लेगी और इनके परिसीमन, आरक्षण के साथ मतदाता सूची के पुनरीक्षण अभियान में जुटेगी। नेताओं के परिवार नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ाया जाएगा।

नवनियुक्त प्रदेश प्रभारी राधामोहन सिंह की मौजूदगी में हुई भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों, क्षेत्रीय अध्यक्षों तथा क्षेत्रीय सह महामंत्री (संगठन) की बैठक में यह फैसला किया गया। अध्यक्षता प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने की।

प्रदेश प्रभारी बनने के बाद पहली बार लखनऊ आए राधामोहन सिंह ने संगठन की चार अलग-अलग बैठकों से मिशन यूपी की शुरुआत की। इनमें दो बैठकों का प्रमुख मुद्दा पंचायत चुनाव रहा जबकि दो बैठकों में मुख्य मुद्दा 2022 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव रहे। संगठनात्मक कार्यक्रमों का खाका भी खींचा गया। सह प्रभारी बनाए गए सुनील ओझा, सत्या कुमार एवं संजीव चौरसिया भी बैठकों में मौजूद थे।

संगठनात्मक पकड़ व पहुंच को और मजबूत बनाने पर विचार

बैठक में पंचायत चुनाव के जरिये पार्टी की जमीनी संगठनात्मक पकड़ व पहुंच को और मजबूत बनाने पर विचार-विमर्श किया गया। प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि भाजपा ने काफी पहले से ही पंचायत चुनाव को लेकर तैयारी शुरू कर दी थी, जिसके अच्छे नतीजे सामने आ रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग भाजपा से पंचायतों का चुनाव लड़ना चाहते हैं।

विचार-विमर्श के दौरान इस बात पर सहमति दिखी कि चुनाव में ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओं को ही मौका दिया जाए। संगठन के पदाधिकारी, विधायक, सांसद या अन्य लोगों के परिवार के लोगों को चुनाव लड़ाने से परहेज किया जाए।

तय हुआ कि मंडलों में 20 दिसंबर तक सम्मेलन करके पंचायत चुनाव के सिलसिले में कार्यकर्ताओं से जमीनी फीडबैक ले लिया जाए। इसमें किसान आंदोलन से लेकर पंचायतों की अपेक्षाओं तक पर बात की जाए ताकि उसके आधार पर रणनीति बनाई जा सके।

पंचायतों के आरक्षण पर लगातार नजर रखने का फैसला किया गया

फिलहाल कार्यकर्ताओं के जरिये पूरा ध्यान पंचायतों की मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनाव के दौरान उठने वाले मुद्दों को समझने पर दिया जाएगा।

पंचायतों के परिसीमन पर नजर रखते हुए कोशिश की जाएगी कि पंचायतों का आकार-प्रकार भाजपा के लिए राजनीतिक तौर पर बहुत प्रतिकूल तो नहीं हो रहा। पंचायतों के आरक्षण पर लगातार नजर रखने का फैसला किया गया।

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संगठनात्मक पकड़ व पहुंच को और मजबूत बनाने पर विचार

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