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Lucknow news- नेता, अफसर चला रहे कार्यदायी संस्थाएं, कैसे लागू हो स्मार्ट घड़ी

एक साल पहले आई थी घड़ी, फर्जीवाड़ा करने वाले ही पड़ रहे भारी

केस – 1

गोमतीनगर के पते पर रजिस्टर्ड एक कार्यदायी संस्था सफाई के अलावा पार्किंग व अन्य काम भी करती है। संस्था में नगर निगम के एक अफसर की साझेदारी है। नगर निगम के ज्यादातर अफसर भी इस बात को जानते हैं, मगर आपसी मिलीभगत से सब चल रहा है।

केस- 2
नगर निगम की अफसर की सरपरस्ती में भी एक कार्यदायी संस्था काम कर रही है। हरियाली वाले विभाग से शुरुआत करने वाली इस संस्था ने अपने पांव अब गाड़ियों और सड़क पर रोशनी करने वाले विभाग तक बढ़ा लिए हैं।
केस- 3
सत्ताधारी दल के कई जनसेवक भी दूसरे नामों से कार्यदायी संस्थाएं चलवा रहे हैं। भुगतान को लेकर दबावा भी बनाते रहते हैं। एक जनसेवक पहले इनकी खूब शिकायत करते थे, मगर जब से अपनी संस्था बना ली तो मौन धारण कर लिए हैं।
केस – 4
निराला नगर और डालीगंज के पते पर रजिस्टर्ड करीब छह कार्यदायी संस्थाएं सफाई कार्य से जुड़े कथित कर्मचारी नेता ही दूसरे नामों से चला रहे हैं। उनके साथ स्वास्थ्य विभाग के पुराने लिपिक की भी कई कार्यदायी संस्थाएं हैं।
नगर निगम में इस समय 33 कार्यदायी संस्थाएं सफाई श्रमिक उपलब्ध कराने का काम कर रही हैं, इनमें 50 प्रतिशत संस्थाएं नगर निगम के जनसेवक, कर्मचारी, कर्मचारी नेता और जनप्रतिनिधि ही दूसरे नामों से चला रहे हैं। सालाना करीब 70 करोड़ रुपये बजट का यह काम सबको इतना भा रहा है कि इसमें जरा भी सी बाधा उन्हें परेशान कर देती है। यही वजह है कि फर्जीवाड़ा रोकने के लिए स्मार्ट घड़ी की व्यवस्था किसी को भी रास नहीं आ रही।
नगर निगम ने साल भर पहले जब स्मार्ट घड़ी पहली बार लागू की गई थी तो फर्जीवाड़ा खुलकर सामने आ गया था। पहले तो सबने घड़ी पहनी नहीं, जिन्होंने पहनी उनमें से तमाम कर्मचारियों की लोकेशन शहर से बाहर की आती थी। जोन आठ से हुई शुरुआत में पता चला कि जितने कर्मचारियों पर पैसा खर्च हो रहा था, उसके चालीस से पचास प्रतिशत ही कर्मचारी उपस्थित दिख रहे थे। इसके बाद फर्जीवाड़ा करने वालों ने दबाव डलवाकर व्यवस्था को ठंडे बस्ते में डलवा दिया। दूसरी मांग को लेकर कर्मचारियों से प्रदर्शन भी कराया गया।
24 वार्डों में सबसे अधिक धांधली
नगर निगम के जोन चार, आठ, तीन, पांच, दो और एक में 24 से अधिक वार्ड ऐसे हैं, जहां पर 50 से 150 तक कार्यदायी संस्थाओं के श्रमिक लगे हैं। ऐसे में सबसे अधिक मलाई भी यहीं काट रहे हैं। जानकार बताते हैं कि एक तो कार्यदायी संस्थाएं पूरे कर्मचारी नहीं लगाती और जो लगाती हैं उनको महज पांच से छह हजार रुपये ही देती हैं। जबिक नगर निगम से अभी साढ़े सात हजार रुपये मिल रहे हैं और जल्द ही नौ हजार महीना प्रति कर्मचारी मिलेगा।
अपर नगर आयुक्त को मिला स्वीकृति बढ़ाने का अधिकार
कार्यदायी संस्थाओं को एक बार में 89 दिन की स्वीकृति दी जाती है। उसके बाद स्वीकृति बढ़ाने का अधिकार नगर आयुक्त ने अपर नगर आयुक्त को दिया है। मगर पहली बार स्वीकृति नगर आयुक्त के स्तर से ही होगी। उसको लेकर नगर आयुक्त अजय द्विवेदी की ओर से आदेश भी जारी कर दिया गया है।
जांच के बाद होगी कार्रवाई
नगर निगम के कर्मचारी, अधिकारी या उनके परिवार के सदस्य नगर निगम में ठेकेदारी नहीं कर सकते। यदि कोई ऐसा कर रहा है तो उसके खिलाफ जांच कर कार्रवाई की जाएगी। ऐसी कोई शिकायत अभी नहीं मिली है, हो सकता है कि दूसरे नामों से ठेकेदारी कर रहे हैं। जो कार्यदायी संस्थाएं काम कर रही हैं उनके पते की सही से जांच होनी चाहिए। इसको लेकर निर्देश दिए जाएंगे, पंजीकरण के समय पते का स्थलीय सत्यापन जरूर किया जाए। यदि कोई शिकायत आएगी तो उस पर कार्रवाई होगी।
– अजय द्विवेदी, नगर आयुक्त

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