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Lucknow news- बिना सीना चीरे दिल का वॉल्व बदलने की तकनीकी से मरीजों को दे रहे राहत

चंद्रभान यादव

लखनऊ। राजधानी में बिना सीना चीरे हृदय के वॉल्व बदलने की नई तकनीक का चलन बढ़ रहा है। चिकित्सा संस्थानों के साथ सभी कॉरपोरेट अस्पतालों में ट्रांसकैथेटर एरोटिक वॉल्व रिप्लेसमेंट (टीएवीआर) और ट्रांसकैथेटर एरोटिक वॉल्व इंप्लांटेशन (टीएवीआई) तकनीक को इस्तेमाल में लाया जा रहा है।

तमाम ऐसे मरीज भी होते हैं, जिनकी ओपेन हार्ट सर्जरी नहीं की जा सकती है उनके लिए इस तकनीक को कारगर माना गया है। उत्तर प्रदेश में टीएवीआई तकनीक का इस्तेमाल पहली बार 2016 में एसजीपीजीआई के कार्डियालॉजी में हुआ। हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. पीके गोयल लगातार इससे मरीजों को राहत दे रहे हैं। अब तक करीब 30 सर्जरी की जा चुकी है। इसके बाद केजीएमयू ने इस तकनीक से कई मरीजों को राहत दी। अब कॉरपोरेट अस्पतालों में भी इसका प्रयोग हो रहा है। इसमें पैर की बड़ी धमनी (आर्टरी) के माध्यम से लगभग 3 सेमी व्यास का वॉल्व दिल में स्थापित किया जाता है।

ऐसे काम करती है तकनीक

इस तकनीक में पैर की नस या कमर के पास से कैथेटर लेकर दिल तक पहुंचा जाता है और वहां वॉल्व स्थापित किया जाता है। इसमें एनेस्थेटिस्ट को भी काफी सहूलियत होती है। खास बात है कि यह उन मरीजों के लिए भी कारगर है, जिनका हार्ट फंक्शन बेहद कम हो जाता है या जिनके हृदय का पंपिंग सिस्टम कमजोर होता है।

बुजुर्गों के लिए है कारगर

हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. गौतम स्वरूप ने बताया कि वह बुजुर्गों में इस तकनीक का लगातार प्रयोग कर रहे हैं। एओर्टिक स्टेनोसिस (एएस) हृदय की धमनी की बीमारी है। यह वॉल्व हृदय से शरीर के अन्य हिस्से में रक्त संचार नियंत्रित करना है। धमनियों के संकरा हो जाने से यह समस्या होती है। इसके पांच से 10 फीसदी मरीज 70 साल से अधिक उम्र वाले होते हैं। इनकी ओपेन सर्जरी कष्टकारी होती है। ऐसे में इनके लिए इस तकनीक को सुरक्षित माना गया है।

मरीज बढ़े तो कम हो रही लागत

केजीएमयू के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. अक्षय प्रधान ने बताया कि यह तकनीक वृद्धों में बेहद कारगर है। क्योंकि इस उम्र में बड़ा चीरा लगने से जोखिम बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि निजी चिकित्सा संस्थानों में इस तकनीक से इलाज पर 15 लाख रुपये से अधिक खर्च आता है, जबकि लारी कार्डियोलॉजी में इसे 12 से 13 लाख में किया जा रहा है।

यह है बचाव का तरीका

हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. गौरव चौधरी बताते हैं कि कुछ लोग हृदय संबंधी बीमारी होते ही फैट पूरी तरह से कम कर देते हैं। यह गलत है। इससे हार्मोन्स का संतुलन बिगड़ जाता है। कुछ मात्रा में फैट लेते हुए वजन नियंत्रित रखने का प्रयास करना चाहिए। हृदय रोगियों में 50 फीसदी मधुमेह और ब्लड प्रेशर के हैं। शुरुआत में इलाज शुरू कर दिया जाए तो दवाओं से बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। हृदय रोगियों को खानपान में अच्छी गुणवत्ता वाले तेल का प्रयोग करना चाहिए। सुबह साइकिलिंग या वॉकिंग जरूर करें। जंक फूड के बजाय परंपरागत खाने पर जोर दें। खाने में दोनों वक्त सलाद जरूर लें। जिन मरीजों को लगातार सीने में दर्द बना रहे वे हृदय रोग विशेषज्ञ से दवाएं लें। कुछ मरीज बीच में दवा छोड़ देते हैं, जिससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। पहली बार अटैक पड़े तो भी खानपान सुधार लें। दवाएं लेने और वॉकिंग शुरू कर दे तो दोबारा अटैक का खतरा कम हो जाता है।

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