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Lucknow news- लोकगीतों से खिलखिलाता अवध का आंगन, मार्च से शुरू हो नवंबर तक चलता है लोकगीतों का कारवां

नीरज अम्बुज

लखनऊ। सुर, लय और ताल को जब लोकगीतों की चाशनी में पागा जाता है तो उससे पैदा होने वाली धुन व संगीत रूह की गहराइयों में उतर जाती है। ऐसे ही लोकगीतों का कारवां प्रदेश में वर्षभर चलता है। मार्च में फाग, होली गीतों से शुरू होकर रोमांस के मौसम सावन से गुजरते हुए नवंबर में पर्व व फसली गीतों पर यह कारवां थमता है। मार्च में फिर से पींगे भरने को कारवां तैयार हो जाता है। जो अपने साथ पारंपरिक लोकगीतों के इतने नायाब नगीने लाता है, जिन्हें थाती के तौर पर सहेजकर रखने की जरूरत है।

फाग की बहार, चैती की फुहार

मार्च यानी होली का महीना। वसंत के समापन के साथ ही फाग की फुहार माहौल को खुशमिजाज बनाने लगती है। फाग ‘बृज में खेलत फाग मुरारी, बृजबन में खेले होरी’ काफी पसंद किया जाता है। होली गीतों में धमार, डेढ़ ताल, रसिया, ऊलारा, लचका, झूमर, बेलवरिया और दादरा प्रमुख हैं। इसके अलावा चौतकुला ‘बृज में आज मची होरी, फगुआ में रंग रस रस बरसे’, ‘आज ब्रज में होली रे रसिया’, ‘होली खेले गोपियों संग’ और ‘कवाने बनावा बोलेले कोयलिया’ लोकगीत लोग खूब पसंद करते हैं, जो अप्रैल शुरू होने तक चलता है। इसके बाद चैत शुरू होते ही चैती सुनाई देने लगती हैं। हिंदू परंपराओं के अनुसार नए वर्ष की शुरुआत इसी से होती है। इसलिए मुख्यत: खुशी के गीत गाए जाते हैं। मसलन, ‘चैत मास चुनरी रंगाय दीजो बालम लाली रे लाली…’ और ‘हमरा गुलाबी दुपट्टा हमें तो लग जाइये नजरिया हो…’ आदि।

सावन में बादलों की लुकाछिपी का खेल

सबसे ज्यादा गीत जुलाई से लेकर सितंबर में गाए जाते हैं। इनमें भी विशेष रूप से धान की रोपाई के वक्त। मायके लौटी नायिका घरवालों को अपना ऐश्वर्य और वैभव गीतों के जरिए दिखाती है। वह अपनी फरमाइशें भी पति से रखती है। चूंकि, फसलों की बुवाई से कटाई तक खर्च के कारण उसकी मांगे पूरी नहीं हो पाती। रोमांस के इन चार महीनों में कजरी विशेष रूप से गाई जाती है, जिसमें अवधी और ‘सइयां जाने दे नइहरवा कजरिया बीती जाए…’ व मीरजापुरी कजरी ‘अबकी सावन में झूलनी गढ़ाई दा पिया…’ विशेष है। इसके अलावा मेंहदी गीत, झूला गीत, बरखा गीत, चौमासा और बारहमासा विशेष हैं। कई चौमासों पर तो फिल्मी गीत भी बनाए जा चुके हैं। मसलन, चौमासा ‘ऐसी बरखा मा बदरिया घनघोर, बोलत है दादुर (मेंढक) मोर बलमा…’ प्रसिद्ध है।

पर्व और श्रम गीतों का महीना अक्तूबर

चौमासा के खत्म होते ही श्रम, फसली व पर्व गीतों का माहौल बनने लगता है। दीपावली जैसे प्रमुख पर्व से लेकर फसलों की बुआई व कटाई पर लोकगीत गाए जाते हैं, जिसकी शुरुआत नौरात्र यानी कुंवार (अक्तूबर) से होती है। इसमें विशुद्ध रूप से देवी गीतों ‘मइया चलो दीना बार हमारे अंगना, पड़े चरण तुहार हमारे अंगना’ गाए जाते हैं। चूंकि, चौमासे में शुभ कार्य नहीं कराए जाते। ऐसा माना जाता है कि इन महीनों में भगवान विष्णु सो जाते हैं। इसलिए इसके खत्म होते ही शुभ लग्न का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। इसमें विवाह संस्कारों के लोकगीत शुरू हो जाते हैं। बता दें कि विवाह संस्कार में बरखोजाई, न्यौता, तिलक, मंडप, हल्दी, सेहरा, चुमावन, घोड़ी, बन्ना बन्नी, सहाणे, ज्योनार, परिछन, द्वारचार, सुहाग, जयमाला आदि लोकगीत गाए जाते हैं।

नवंबर से फरवरी तक सिर्फ धुंध

कार्तिक, अगहन पूस और माघ यानी नवंबर से लेकर फरवरी तक के महीने ऐसे होते हैं, जब लोकगीतों का कारवां ठहर सा जाता है। या यूं कहें कि लोकगीतों पर धुंध सी छा जाती है। चूंकि, ठण्ड बढ़ने और फसली काम भी रुकने से लोग रजाइयों में दुबके रहते हैं, इसलिए लोकगीत भी फिजां में नहीं घुलते। इसके बाद जैसे ही मार्च शुरू होता है फाग, फिर चैती, सावन, देवी, पर्व, श्रम गीतों तक का सफर लोकगीतों का कारवां तय करता है।

वर्षभर गाए जाने वाले गीत

होली : बसंत, फाग, होरी, धमार, लचका, उलारा, बेलवरिया और दादरा

वर्षा गीत : कजरी, झूला, सावन, चौमासा, बारहमासा, मेंहदी, बिरना, घाटौ

जाति गीत : कहरा, धोबिया, माझी, ददरिया, मल्हो, कुम्हरऊ, तेली, गड़रिया आदि

फसली गीत : निराई, चकिया, कोल्हू, चरखा, महुआ, सीला, खेत खलियान रखवाली आदि

विवाह संस्कार : देवीगीत, बरखोजाई, न्यौता, तिलक, मण्डप, हल्दी, सेहरा, चुमावन, घोड़ी, बन्ना बन्नी, सहाणे, ज्योनार, परिछन, द्वारचार, सुहाग, जयमाला आदि

(इसके अलावा 16 संस्कारों गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोनयन, जातकर्म, नामकरन, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, शुद्ध कर्म, कर्णभेद, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, संन्यास और अंत्येष्टि में भी ये गीत गाए जाते हैं।)

मुस्लिमों की भी देन हैं लोकगीत

यह सच है कि लोकगीतों का सिलसिला हिंदुस्तान की संस्कृति रही है, लेकिन बाहर से मुसलमानों, जोकि बाद में यही की संस्कृति और सभ्यता में रचबस गए ने भी कई लोकगीतों की शुरुआत की। जिन्हें बाद में अन्य साथियों ने भी आत्मसात किया। मसलन, निकाह के दौरान गाए जाने वाला लोकगीत ‘सहाणे’ और अवधी क्षेत्र के मुस्लिमों द्वारा शुरू किया गया ‘बन्ना-बन्नी’ इत्यादि। ‘बन्ना-बन्नी’ की चर्चा का आलम यह है कि कई हिंदी फिल्मों में भी ये गीत शामिल किए गए।

150 लोकगीतों पर संकट

लुप्तप्राय हो रहे लोकगीतों के संरक्षण पर काम करने वाली आकाशवाणी की अनामिका श्रीवास्तव बताती हैं कि बढ़ते शहरीकरण के कारण देहातों से तमाम परंपराएं समाप्त होती जा रही है। इसमें पारंपरिक लोकगीत भी शामिल हैं। जन्म से लेकर मृत्यु व सुबह से लेकर शाम तक और वसंत पंचमी से लेकर नागपंचमी व होली से लेकर दीवाली तक हर पर्व पर लोकगीतों की परंपरा है। गांवों में जिन बुजुर्गों के पास लोकगीतों की थाती है, उसे सीखने में नई पीढ़ी रुचि नहीं ले रही। यही कारण है कि प्रदेश में करीब 150 ऐसे लोकगीत हैं, जो लुप्त होने के कगार पर हैं।

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