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Lucknow news- साक्षात्कार : अमां…नेपोटिज्म हम क्या जानें, हमें काम-सम्मान घर से बुलाकर मिला : फर्रूख जाफर

रोली खन्ना

लखनऊ। उमराव जान से लेकर गुलाबो-सिताबो तक सफर तय कर फिल्म फेयर के रेड कारपेट तक पहुंचीं लखनऊ की बेगम फर्रूख जाफर भारतीय सिनेमा जगत पर लगते नेपोटिज्म के आरोपों को सिरे से नकारती हैं। वह कहती हैं, अमां…हम क्या जानें नेपोटिज्म क्या होता है, हमें तो इसे बोलने में भी मेहनत लगती है। हमें काम और सम्मान हमेशा से घर से बुलाकर मिला है। हमारे हुनर को हमेशा इज्जत मिली, फिल्म फेयर अवॉर्ड इसकी एक बानगी है। इसके लिए भारतीय सिनेमा उद्योग का तहे दिल से शुक्रिया करती हूं।

28 मार्च को जब काले रंग की फिल्म फेयर ट्रॉफी उनके हाथ में दी गई तो सोशल मीडिया पर बधाइयों के साथ एक शब्द लिखा गया ‘द ब्लैक लेडी नाऊ इन……’। फर्रूख किसी के लिए अम्मा तो किसी के लिए बेगम हैं। फिल्म फेयर अवॉर्ड हासिल कर लखनऊ पहुंचने पर मंगलवार को गोमतीनगर स्थित उनके आवास पर अमर उजाला ने उनसे खास मुलाकात की। उम्र के 88वें वर्ष में प्रवेश कर चुकीं फर्रूख की कजरारी आंखों की चमक उम्र की थकान को मुंह चिढ़ाती दिखीं। हर बात की शुरुआत अमां….से करना उनकी शख्सियत केअलग ही अंदाज को बयां करता है। अतीत और वर्तमान की कई सुनहरी यादें इन आंखों में छिपी हैं, उससे भी बढ़कर है बेगम की ख्वाहिश कि बस हर वक्त कैमरे के सामने रहूं।

बिना पूछे कह गईं दिल की बात

बीते दिनों कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण उन्हें वॉकर का सहारा लेना पड़ रहा है, इसके बावजूद उम्र से उनका संघर्ष जारी है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, लोग कहते हैं कि सम्मान बिकते हैं, काम के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, अपना घर-बार छोड़ना पड़ता है। मैंने सम्मान और काम के लिए कुछ नहीं दिया, लखनऊ कभी नहीं छोड़ा, यहीं रहकर काम किया। मुजफ्फर अली से लेकर सुजीत सरकार तक ने यहां आकर काम कराया।

हमें तो कैमरा ताकत देता है

वह कहती हैं कि अमां….. कैमरे के सामने आने के बाद कब समय निकल जाता है पता ही नहीं चलता है। कैमरे से मुझे ताकत मिलती है, मैं सबसे यही कहना चाहती हूं कि थको कभी मत, खूब काम करो। उमराव जान और रेखा मेरे दिल के करीब हैं, उस वक्त जिस तरह काम करती थी, आज भी उतना ही करती हूं और करती रहूंगी।

हुनर की कद्र करना जानते हैं डायरेक्टर, मेरे लिए तो उन्होंने बहुत कुछ बदला

फर्रुख इन दिनों कूल्हे में फ्रैक्चर की वजह से थोड़ा दर्द में हैं। कहती हैं, हुनर की कद्र करना जानते हैं डायरेक्टर, मेरे लिए तो उन्होंने बहुत कुछ बदला। उनकी भावनाओं को शब्द देते हुए उनकी बेटी महरू जाफर कहती हैं कि अम्मा अब पीपली लाइव की तरह बड़े डायलॉग नहीं बोल पातीं। गुलाबो-सिताबो केलिए सुजीत सरकार ने तो जोगीरा के लिए कुशान नंदी ने उनके लिए विशेष तौर पर छोटे डायलॉग तैयार करवाए। इसी तरह फिल्म फोटोग्राफ के डायरेक्टर रितेश बत्रा ने पहले उनके लिए मां का रोल तय किया था। कूल्हे में फ्रैक्चर के कारण उन्हें दादी बना दिया। इसी तरह मेहरुनिसा के लिए उन्हें बतौर हीरोइन लेना बताता है कि इंडस्ट्री हुनर को किस तरह से तवज्जो देती है।

विविध भारती, एनएसडी और फिर सेल्युलाइड तक

फर्रुख जाफर ने अपना कॅरिअर रेडियो में बतौर अनाउंसर शुरू किया था। गीतों भरी कहानी नामक प्रोग्राम काफी यादगार रहा, जिसमें वे गीतों के बीच में सुनाई जाने वाली कहानियों को अपनी आवाज देतीं थी और गीतों का चयन करती थीं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में वह शाम की क्लास करती थीं। लखनऊ में थियेटर करती थीं। एनएसडी से कोर्स करने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय मंच पर अल्काजी के निर्देशन में इटैलियन नाटक ‘सिक्स कैरेक्टर्स इन सर्च आफ एन ऑथर’ में एक अहम किरदार निभाया। उमराव जान, स्वदेस, सीक्रेट सुपरस्टार समेत टेली फिल्मों व थियेटर में भी अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी हुई है। सिलसिला जोगीरा सा… रा… रा… तक में जारी है।

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